Stretching Vs Exercise: फर्क बस नज़रिए का है

Stretching Vs Exercise: फर्क बस नज़रिए का है

आजकल फिट रहना सिर्फ़ एक ट्रेंड नहीं, ज़रूरत बन गया है।
पिछले कुछ सालों में मैंने खुद महसूस किया कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर कुछ बातें खुद ही बताने लगता है। पीठ में खिंचाव, गर्दन में अकड़न, और सुबह उठते ही भारीपन — ये सब इशारा करते हैं कि "अब तो कुछ करना पड़ेगा यार।"


स्ट्रेचिंग – छोटी-सी चीज़, बड़ा असर

मैं पहले सोचता था कि स्ट्रेचिंग तो बस वॉर्मअप के लिए होती है, असली काम तो एक्सरसाइज़ ही है। लेकिन जब एक दिन कमर में ऐसी पकड़ आई कि चलना मुश्किल हो गया, तब एक फिजियो ने कहा – "हर दिन सिर्फ़ 10 मिनट स्ट्रेच कर लो, फर्क खुद दिखेगा।"
और सच कहूं? फर्क दिखा।

सुबह-सुबह जब सब सो रहे होते हैं, और मैं अकेला मैट पर बैठकर हाथ-पैर फैलाता हूं, एक अजीब-सा सुकून मिलता है। जैसे शरीर कह रहा हो – "थैंक यू यार, आज तो मेरा भी ख्याल रखा।"

एक्सरसाइज़ – खुद से किया गया एक वादा

जिम जाना या घर पर पसीना बहाना आसान नहीं होता। टाइम नहीं होता, मन नहीं होता। लेकिन हर बार जब मैं 20 मिनट कार्डियो कर लेता हूं या थोड़े पुशअप्स लगाता हूं, तो एक अजीब-सी खुशी होती है।
जैसे मैं खुद से कह रहा हूं – "देख, तू कर सकता है।"
ये सिर्फ़ बॉडी बनाने का नहीं, माइंड सेट बदलने का तरीका है।

स्ट्रेचिंग Vs एक्सरसाइज़ – किसे चुनें?

अगर मुझसे कोई पूछे कि क्या ज़रूरी है – स्ट्रेचिंग या एक्सरसाइज़?
तो मैं कहूंगा – दोनों।
एक तुम्हें लचीला बनाता है, दूसरा मजबूत।
एक शरीर को आराम देता है, दूसरा उसे चुनौती देता है।

शुरुआत सबसे जरूरी है

कोई भी आदत एक दिन में नहीं बनती।
शुरुआत बस 5-10 मिनट से होती है।
और जब आप उस एक दिन की मेहनत के बाद खुद को थोड़ा बेहतर महसूस करते हो – वही मोमेंट सब कुछ बदल देता है।


आख़िरी बात...
ज़िंदगी में सबको देने के चक्कर में हम खुद को भूल जाते हैं।
पर शरीर एक ही है, और इसका ख्याल हमें ही रखना है।
तो चाहे स्ट्रेचिंग से शुरू करो या एक्सरसाइज़ से – बस शुरू करो
क्योंकि सेहत से बड़ा कोई तोहफ़ा नहीं।

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